गिरफ़्तार मज़दूर नेताओं की रिहाई, मज़दूरों की मांगें 10 दिन में लागू कराने के लिखित समझौते के बाद आन्दोलन स्थगित
ज़िलाधिकारी कार्यालय पर चार दिन से चल रहा धरना और भूख हड़ताल समाप्त
साथियो,
गोरखपुर में चल रहे मज़दूर आन्दोलन में मजूदरों और नागरिकों के भारी दबाव के आगे अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा और कल रात (22 अक्टूबर) सभी माँगों को मानने के लिए लिखित समझौता करना पड़ा। इससे पहले 21 अक्टूबर की रात को प्रशासन ने चारों गिरफ़्तार मज़दूर नेताओं को बिना शर्त रिहा कर दिया था।
मज़दूर नेताओं की अवैध गिरफ्तारी और बर्बर पिटाई के विरोध में 20 अक्टूबर को बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र के पांच कारखानों में हड़ताल हो गई थी और 1500 से अधिक मज़दूरों ने ज़िलाधिकारी कार्यालय पर धरना और क्रमिक भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। कात्यायनी जी के नेतृत्व में गठित गोरखपुर मजदूर आंदोलन समर्थक नागरिक मोर्चा की ओर से गोरखपुर में नागरिक सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने की घोषणा से ज़िला प्रशासन पर और भी दबाव बढ़ गया था। कलक्ट्रेट परिसर में बैठे मजदूरों को भारी संख्या में पुलिस, पीएसी व रैपिड ऐक्शन फोर्स ने घेर रखा था, लेकिन मजदूर बड़ी संख्या में डटे रहे। 21 अक्टूबर को जबर्दस्त प्रदर्शन, शहर के नागरिकों और विभिन्न संगठनों के दबाव और दिन भर चली वार्ता के बाद रात को प्रशासन ने चारों मज़दूर नेताओं को रिहा कर दिया। लेकिन सभी फर्जी मुकदमे हटाने, पिटाई के दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई और मजदूरों की मांगें पूरी कराने के लिखित आश्वासन की मांग पर भूख हड़ताल और धरना जारी रहा।
22 अक्टूबर को दो अन्य कारखानों के मजदूर भी काम बन्द करके जिलाधिकारी कार्यालय पर धरने में शामिल हो गए। इसके बाद शाम को प्रशासन ने फर्जी मुकदमे हटाने, दोषी अधिकारियों के विरुद्ध जांच की सिफारिश प्रदेश सरकार को भेजने और 10 दिनों के भीतर मजदूरों की सभी मांगें पूरी करने का लिखित आश्वासन दिया और वरिष्ठ अधिकारियों ने मजदूरों के सामने इसकी घोषणा की। इसके बाद आन्दोलन को स्थगित करने का फैसला लिया गया।
आज के दौर में जब कदम-कदम पर मजदूरों को मालिकों और शासन-प्रशासन के गंठजोड़ के सामने हार का सामना करना पड़ रहा है, गोरखपुर के मजदूरों की यह जीत बहुत महत्वपूर्ण है। मजदूरों की एकजुटता और देश भर से मिले बुद्धिजीवियों, जनाधिकार कर्मियों और मजदूर संगठनों के व्यापक समर्थन के बिना यह मुमकिन नहीं था।
गोरखपुर के अलावा, लखनऊ, दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद, मुंबई, पटना, कोलकाता, लुधियाना, चंडीगढ़, इलाहाबाद, कानपूर, वाराणसी, बदायूं, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि से बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों व जनसंगठनों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार को ज्ञापन भेजे, अफसरों को फोन किये, बयान जारी किये। आप आंदोलन की सारी जानकारी तथा अखबारों में छपी खबरें और तस्वीरें ब्लॉग पर देख सकते हैं। ब्लॉग का पता है: http://bigulakhbar.blogspot.com
Tuesday, October 27, 2009
Thursday, October 22, 2009
मज़दूर संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं,बुद्धिजीवियों से अपील
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में करीब ढाई महीने से चल रहे मज़दूर आन्दोलन को कुचलने के लिए प्रशासन ने फैक्ट्री मालिकों के इशारे पर एकदम नंगा आतंकराज कायम कर दिया है। गिरफ्तारियां, फर्जी मुकदमे, मीडिया के जरिए दुष्प्रचार व धमकियों के जरिए मालिक-प्रशासन-नेताशाही का गंठजोड़ किसी भी कीमत पर इस न्यायपूर्ण आंदोलन को कुचलने पर आमादा है। 15 अक्टूबर की रात संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के तीन नेतृत्वकारी कार्यकर्ताओं - प्रशांत, प्रमोद कुमार और तपीश मैंदोला को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस उन पर शांति भंग जैसी मामूली धाराएं ही लगा पाई लेकिन फिर भी 16 अक्टूबर को सिटी मजिस्ट्रेट ने उन्हें ज़मानत देने से इंकार करके 22 अक्टूबर तक जेल भेज दिया। इससे पहले 15 अक्टूबर की रात ज़िला प्रशासन ने तीनों नेताओं को बातचीत के लिए एडीएम सिटी के कार्यालय में बुलाया जहां काफी देर तक उन्हें जबरन बैठाये रखा गया और उनके मोबाइल फोन बंद कर दिये गये। उन्हें आन्दोलन से अलग हो जाने के लिए धमकियां दी गईं। इसके बाद उन्हें कैंट थाने ले जाया गया जहां उनके साथ मारपीट की गई। इसके अगले दिन मालिकों की ओर से इन तीन नेताओं के अलावा 9 मजदूरों पर जबरन मिल बंद कराने, धमकियां देने जैसे आरोपों में एकदम झूठा मुकदमा दर्ज कर लिया गया। गिरफ्तारी वाले दिन से ही जिला प्र्रशासन के अफसर ऐसे बयान दे रहे हैं कि इन मजदूर नेताओं को ”माओवादी“ होने की आशंका में गिरफ्तार किया गया है और उनके पास से ”आपत्तिजनक“ साहित्य आदि बरामद किया गया है। उल्लेखनीय है कि गोरखपुर के सांसद की अगुवाई में स्थानीय उद्योगपतियों और प्रशासन की ओर से शुरू से ही आन्दोलन को बदनाम करने के लिए इन नेताओं पर ‘‘नक्सली’’ और ‘‘बाहरी’’ होने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ अफसरों ने स्थानीय पत्रकारों को बताया है कि पुलिस इन नेताओं को लंबे समय तक अंदर रखने के लिए मामला तैयार कर रही है।
इससे पहले 15 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय में अनशन और धरने पर बैठे मजदूरों पर हमला बोलकर उन्हें वहां से हटा दिया गया। महिला मजदूरों को घसीट-घसीटकर वहां से हटाया गया। प्रशांत, प्रमोद एवं तपीश को ले जाने का विरोध कर रही महिलाओं के साथ मारपीट की गई। ये मजदूर स्वयं प्रशासन द्वारा पिछले 24 सितम्बर को कराये गये समझौते को लागू कराने की मांग पिछले कई दिनों से प्रशासन से कर रहे थे। 3 अगस्त से जारी आन्दोलन के पक्ष में जबर्दस्त जनदबाव के चलते प्रशासन ने समझौता कराया था लेकिन मिलमालिकों ने उसे लागू ही नहीं किया। समझौते के बाद दो सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आधे से अधिक मजदूरों को काम पर नहीं लिया गया है। थक हारकर 14 अक्टूबर से जब वे डीएम कार्यालय पर अनशन पर बैठे तो प्रशासन पूरी ताकत से उन पर टूट पड़ा। मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के इन मजदूरों की मांगें बेहद मामूली हैं। वे न्यूनतम मजदूरी, जॉब कार्ड, ईएसआई कार्ड देने जैसे बेहद बुनियादी हक मांग रहे हैं, श्रम कानूनों के महज़ कुछ हिस्सों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। बिना किसी सुविधा के 12-12 घंटे, बेहद कम मजदूरी पर, अत्यंत असुरक्षित और असहनीय परिस्थितियों में ये मजदूर आधुनिक गुलामों की तरह से काम करते रहे हैं। गोरखपुर के सभी कारखानों में ऐसे ही हालात हैं। किसी कारखाने में यूनियन नहीं है, संगठित होने की किसी भी कोशिश को फौरन कुचल दिया जाता है। पहली बार करीब पांच महीने पहले तीन कारखानों के मजूदरों ने संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा बनाकर न्यूनतम मजदूरी देने और काम के घंटे कम करने की लड़ाई लड़ी और आंशिक कामयाबी पायी। इससे बरसों से नारकीय हालात में खट रहे हजारों अन्य मजदूरों को भी हौसला मिला। इसीलिए यह मजदूर आन्दोलन इन दो कारखानों के ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम उद्योगपतियों को बुरी तरह खटक रहा है और वे हर कीमत पर इसे कुचलकर मजदूरों को ”सबक सिखा देना“ चाहते हैं। कारखाना मालिक पवन बथवाल दबंग कांगे्रसी नेता है और भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। प्रशासन और श्रम विभाग के अफसर बिके हुए हैं। शहर में आम चर्चा है कि मालिकों ने अफसरों को खरीदने के लिए दोनों हाथों से पैसा लुटाया है। मजदूरों ने पिछले दो महीनों के दौरान गोरखपुर से लेकर लखनऊ तक, हर स्तर पर बार-बार अपनी बात पहुंचायी है लेकिन ”सर्वजन हिताय“ की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है। मजदूरों और नेतृत्व के लोगों को डराने-धमकाने, फोड़ने की हर कोशिश नाकाम हो जाने के बाद पिछले महीने से यह सुनियोजित मुहिम छेड़ दी गई कि इस आन्दोलन को ‘‘माओवादी आंतकवादी’’ और ‘‘बाहरी तत्व’’ चला रहे हैं और यह ”पूर्वी उत्तर प्रदेश को अस्थिर करने की साज़िश“ है। इससे बड़ा झूठ कोई नहीं हो सकता।
आप क्या कर सकते हैं - मज़दूर आन्दोलन के दमन और मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव, श्रम और श्रम मंत्री को, तथा गोरखुपर के जिलाधिकारी को फैक्स, ईमेल या स्पीडपोस्ट से विरोधपत्र भेजें। ईमेल की एक प्रति कृपया हमें भी फारवर्ड कर दें। - इस मुद्दे पर बैठकें तथा धरना-विरोध प्रदर्शन आयोजित करें। - अपने संगठनों की ओर से अपनी ओर से इसके विरोध में बयान जारी करें और हस्ताक्षर अभियान चलाकर उपरोक्त पतों पर भेजें। - दिल्ली में 21 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश भवन पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।
गोरखपुर के मजदूर आन्दोलन के समर्थक बुद्धिजीवियों, आम नागरिकों, छात्रों-युवाओं की ओर से,
कात्यायनी, सत्यम, मीनाक्षी, रामबाबू, कमला पाण्डेय, संदीप, संजीव माथुर, जयपुष्प, कपिल स्वामी, अभिनव, सुखविन्दर, डा. दूधनाथ, शिवार्थ पाण्डेय, अजय स्वामी, शिवानी कौल, लता, श्वेता, नेहा, लखविन्दर, राजविन्दर, आशीष, योगेश स्वामी, नमिता, विमला सक्करवाल, चारुचन्द्र पाठक, रूपेश राय, जनार्दन, समीक्षा, राजेन्द्र पासवान…
पतों एवं फ़ोन-फ़ैक्स नंबरों की सूची:
Commissioner 0551 - 2338817 (Fax)
Office of the Commissioner
Collectrate
Gorakhpur - 273001
Commissioner: PK Mahanty - 9936581000
District Magistrate 0551 - 2334569 (Fax)
Office of the District Magistrate
Collectrate
Gorakhpur - 273001
DM: AK Shukla - 9454417544
City Magistrate: Akhilesh Tiwari - 9454416211
Dy Inspector General of Police 0551 - 2201187 / 2333442
Cantt.Gorakhpur:
Dy. Labour Commissioner,
Labour Office
Civil Lines
Gorakhpur-273001
DLC, ML Choudhuri - 9838123667
Governor, BL Joshi
Raj Bhavan, Lucknow,
226001
0522-2220331, 2236992, 2220494
Fax: 0522-2223892
Special Secretary to Governor: 0522-2236113
Km. Mayawati,
Chief Minister
Fifth Floor,
Secretariat Annexe
Lucknow-226001
0522 - 2235733, 2239234 (Fax)
2236181 2239296 2215501 (Phone: (Office)
2236838 2236985Phone: (Res)
Shri Badshah Singh : 0522 - 2238925 (Fax)
Labour Minister,
Department of Labour
Secretariat
Lucknow
Principal Secretary, Labour 0522 - 2237831 (Fax)
Department of Labour
Secretariat
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इससे पहले 15 अक्टूबर को जिलाधिकारी कार्यालय में अनशन और धरने पर बैठे मजदूरों पर हमला बोलकर उन्हें वहां से हटा दिया गया। महिला मजदूरों को घसीट-घसीटकर वहां से हटाया गया। प्रशांत, प्रमोद एवं तपीश को ले जाने का विरोध कर रही महिलाओं के साथ मारपीट की गई। ये मजदूर स्वयं प्रशासन द्वारा पिछले 24 सितम्बर को कराये गये समझौते को लागू कराने की मांग पिछले कई दिनों से प्रशासन से कर रहे थे। 3 अगस्त से जारी आन्दोलन के पक्ष में जबर्दस्त जनदबाव के चलते प्रशासन ने समझौता कराया था लेकिन मिलमालिकों ने उसे लागू ही नहीं किया। समझौते के बाद दो सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आधे से अधिक मजदूरों को काम पर नहीं लिया गया है। थक हारकर 14 अक्टूबर से जब वे डीएम कार्यालय पर अनशन पर बैठे तो प्रशासन पूरी ताकत से उन पर टूट पड़ा। मॉडर्न लेमिनेटर्स लि. और मॉडर्न पैकेजिंग लि. के इन मजदूरों की मांगें बेहद मामूली हैं। वे न्यूनतम मजदूरी, जॉब कार्ड, ईएसआई कार्ड देने जैसे बेहद बुनियादी हक मांग रहे हैं, श्रम कानूनों के महज़ कुछ हिस्सों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। बिना किसी सुविधा के 12-12 घंटे, बेहद कम मजदूरी पर, अत्यंत असुरक्षित और असहनीय परिस्थितियों में ये मजदूर आधुनिक गुलामों की तरह से काम करते रहे हैं। गोरखपुर के सभी कारखानों में ऐसे ही हालात हैं। किसी कारखाने में यूनियन नहीं है, संगठित होने की किसी भी कोशिश को फौरन कुचल दिया जाता है। पहली बार करीब पांच महीने पहले तीन कारखानों के मजूदरों ने संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा बनाकर न्यूनतम मजदूरी देने और काम के घंटे कम करने की लड़ाई लड़ी और आंशिक कामयाबी पायी। इससे बरसों से नारकीय हालात में खट रहे हजारों अन्य मजदूरों को भी हौसला मिला। इसीलिए यह मजदूर आन्दोलन इन दो कारखानों के ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम उद्योगपतियों को बुरी तरह खटक रहा है और वे हर कीमत पर इसे कुचलकर मजदूरों को ”सबक सिखा देना“ चाहते हैं। कारखाना मालिक पवन बथवाल दबंग कांगे्रसी नेता है और भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का उसे खुला समर्थन प्राप्त है। प्रशासन और श्रम विभाग के अफसर बिके हुए हैं। शहर में आम चर्चा है कि मालिकों ने अफसरों को खरीदने के लिए दोनों हाथों से पैसा लुटाया है। मजदूरों ने पिछले दो महीनों के दौरान गोरखपुर से लेकर लखनऊ तक, हर स्तर पर बार-बार अपनी बात पहुंचायी है लेकिन ”सर्वजन हिताय“ की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है। मजदूरों और नेतृत्व के लोगों को डराने-धमकाने, फोड़ने की हर कोशिश नाकाम हो जाने के बाद पिछले महीने से यह सुनियोजित मुहिम छेड़ दी गई कि इस आन्दोलन को ‘‘माओवादी आंतकवादी’’ और ‘‘बाहरी तत्व’’ चला रहे हैं और यह ”पूर्वी उत्तर प्रदेश को अस्थिर करने की साज़िश“ है। इससे बड़ा झूठ कोई नहीं हो सकता।
आप क्या कर सकते हैं - मज़दूर आन्दोलन के दमन और मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव, श्रम और श्रम मंत्री को, तथा गोरखुपर के जिलाधिकारी को फैक्स, ईमेल या स्पीडपोस्ट से विरोधपत्र भेजें। ईमेल की एक प्रति कृपया हमें भी फारवर्ड कर दें। - इस मुद्दे पर बैठकें तथा धरना-विरोध प्रदर्शन आयोजित करें। - अपने संगठनों की ओर से अपनी ओर से इसके विरोध में बयान जारी करें और हस्ताक्षर अभियान चलाकर उपरोक्त पतों पर भेजें। - दिल्ली में 21 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश भवन पर आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।
गोरखपुर के मजदूर आन्दोलन के समर्थक बुद्धिजीवियों, आम नागरिकों, छात्रों-युवाओं की ओर से,
कात्यायनी, सत्यम, मीनाक्षी, रामबाबू, कमला पाण्डेय, संदीप, संजीव माथुर, जयपुष्प, कपिल स्वामी, अभिनव, सुखविन्दर, डा. दूधनाथ, शिवार्थ पाण्डेय, अजय स्वामी, शिवानी कौल, लता, श्वेता, नेहा, लखविन्दर, राजविन्दर, आशीष, योगेश स्वामी, नमिता, विमला सक्करवाल, चारुचन्द्र पाठक, रूपेश राय, जनार्दन, समीक्षा, राजेन्द्र पासवान…
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Wednesday, November 5, 2008
कवि और उनकी कविता
अपने एक मित्र के जरिये मनमोहन जी की कुछ कविताएं पढ़ने को मिली. उनकी कवितायें किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. नीचे उनकी कविताओं का लिंक दिया है, उनसे रूबरू होने पर आप खुद ही समझ जायेंगे
http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/11/blog-post.html
http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/11/blog-post.html
Friday, July 25, 2008
सामाजिक बदलाव के आन्दोलन से जुड़े कर्मठ योद्धा श्री अरविन्द को क्रान्तिकारी सलाम
'दायित्वबोध' पत्रिका के सम्पादक और क्रान्तिकारी कार्यकर्ता अरविन्द सिंह की गुज़री रात गोरखपुर में मृत्यु हो गई। वह पिछले सात दिनों से बीमार चल रहे थे। बुधवार की शाम उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां अचानक उनकी स्थिति बिगड़ गई। बृहस्पतिवार की रात 9:40 पर उन्होंने अन्तिम सांस ली। वे 43 बरस के थे।
विद्यार्थी जीवन से ही अरविन्द सामाजिक बदलाव के आन्दोलन से जुड़े रहे थे। छात्रों की पत्रिका 'आह्नान' के शुरू होने के वक्त वह उसके सम्पादक मंडल में भी थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ और दिल्ली में छात्रों, युवाओं और मज़दूरों के बीच काम किया था। मज़दूर अख़बार 'बिगुल' के सम्पादन-प्रकाशन के साथ ही वह गोरखपुर में सघन आन्दोलनात्मक और सांगठनिक गतिविधियों में व्यस्त थे। एक कुशाग्र लेखक और वक्ता होने के साथ ही अरविन्द एक क्षमतावान अनुवादक भी थे। उन्होंने बड़ी संख्या में सैद्धान्तिक सामग्री के अनुवाद के अलावा देनी दिदेरो की प्रसिध्द उपन्यासिका 'रामो का भतीजा' का भी अनुवाद किया।
अरविन्द अपने पीछे पत्नी मीनाक्षी, जो कि स्वयं एक क्रान्तिकारी कार्यकर्ता हैं, और दोस्तों-मित्रों और हमराहों की एक बड़ी संख्या छोड़ गए हैं।
यह सन्नाटा जब बीत चुका रहेगा यारो
यह ख़ामोशी जब टूट चुकी रहेगी
मुमकिन है कि हम मिलें
तो थोड़े से बचे हुए लोगों के रूप में
कहीं शाल-सागौन के घने सायों में
गुलमोहर-अमलतास-कचनार की बातें करते हुए
हृदय पर एक युद्ध की गहरी छाप लिये
और सबको दिखायी पड़ने वाला एक दूसरा
समूचा का समूचा युद्ध सामने हो।
सन्नाटे के ख़िलाफ
यह युद्ध है ही ऐसा
कि इसमें खेत रहे लोगों को
श्रद्धांजलि नहीं दी जाती,
बस कभी झटके से
वे याद आ जाते हैं
बरबस
अपनी कुछ अच्छाइयों की बदौलत।
इस कर्मठ योद्धा को क्रान्तिकारी सलाम
विद्यार्थी जीवन से ही अरविन्द सामाजिक बदलाव के आन्दोलन से जुड़े रहे थे। छात्रों की पत्रिका 'आह्नान' के शुरू होने के वक्त वह उसके सम्पादक मंडल में भी थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ और दिल्ली में छात्रों, युवाओं और मज़दूरों के बीच काम किया था। मज़दूर अख़बार 'बिगुल' के सम्पादन-प्रकाशन के साथ ही वह गोरखपुर में सघन आन्दोलनात्मक और सांगठनिक गतिविधियों में व्यस्त थे। एक कुशाग्र लेखक और वक्ता होने के साथ ही अरविन्द एक क्षमतावान अनुवादक भी थे। उन्होंने बड़ी संख्या में सैद्धान्तिक सामग्री के अनुवाद के अलावा देनी दिदेरो की प्रसिध्द उपन्यासिका 'रामो का भतीजा' का भी अनुवाद किया।
अरविन्द अपने पीछे पत्नी मीनाक्षी, जो कि स्वयं एक क्रान्तिकारी कार्यकर्ता हैं, और दोस्तों-मित्रों और हमराहों की एक बड़ी संख्या छोड़ गए हैं।
यह सन्नाटा जब बीत चुका रहेगा यारो
यह ख़ामोशी जब टूट चुकी रहेगी
मुमकिन है कि हम मिलें
तो थोड़े से बचे हुए लोगों के रूप में
कहीं शाल-सागौन के घने सायों में
गुलमोहर-अमलतास-कचनार की बातें करते हुए
हृदय पर एक युद्ध की गहरी छाप लिये
और सबको दिखायी पड़ने वाला एक दूसरा
समूचा का समूचा युद्ध सामने हो।
सन्नाटे के ख़िलाफ
यह युद्ध है ही ऐसा
कि इसमें खेत रहे लोगों को
श्रद्धांजलि नहीं दी जाती,
बस कभी झटके से
वे याद आ जाते हैं
बरबस
अपनी कुछ अच्छाइयों की बदौलत।
इस कर्मठ योद्धा को क्रान्तिकारी सलाम
Friday, July 18, 2008
दिल्ली में शोषण के खिलाफ एकजुट हुए बादाम मजदूर, असंगठित थे, अब यूनियन बनाई

पूर्वी दिल्ली के करावल नगर क्षेत्र में बादाम तोड़ने के उद्योग में लगे मज़दूरों ने ठेकेदारों और गोदाम मालिकों के बर्बर शोषण तथा दमन-उत्पीड़न के विरुध्द संघर्ष के लिए कल रात यहां ''बादाम मज़दूर यूनियन'' का गठन किया तथा नवगठित यूनियन के बैनर तले एक विशाल जुलूस निकाला।
ज्ञात है कि करावल नगर इलाके में अमेरिका और आस्ट्रेलिया से आयातित बादाम को तोड़ने के काम में लगभग 10 हजार मज़दूर परिवार लगे हुए हैं और वहाँ कोई भी श्रम कानून लागू नहीं होने के चलते बादाम मजदूर भयंकर शोषण व उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। श्रम-कानून लागू करने तथा न्यूनतम मजदूरी सहित अन्य माँगों को लेकर नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता की अगुवाई में पिछले एक माह से बादाम मजदूर अपनी यूनियन बनाने के लिए प्रयासरत थे। इस सिलसिले में मज़दूरों की अनेक बैठकें की गई थीं और पिछले माह 7 जून को मज़दूरों की एक आम सभा में सर्वसम्मति से बादाम मज़दूरों ने अपनी यूनियन बनाने का फैसला किया था। इसके बाद बादाम मज़दूरों का एक प्रतिनिधि मंडल 8 जुलाई को विश्वकर्मा नगर स्थित श्रम विभाग कार्यालय में अपनी माँगों का ज्ञापन लेकर गया था जहाँ श्रम उपायुक्त लल्लन सिंह ने किसी कार्यवाही के लिए 1 माह का समय माँगा था।
बादाम मज़दूर यूनियन के गठन के प्रयासों तथा मीडिया में मजदूरों के हालात उजागर होने से बौखलाए गोदाम मालिकों व ठेकेदारों ने गत 12 जुलाई को करावलनगर पुलिस थाने के सामने नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता के कार्यकर्ताओं पर अपने गुण्डों से हमला भी करवाया था और सरेआम धमकियां दी थीं कि जो कोई भी यूनियन बनाने की कोशिश करेगा उसे जान से मार देंगे। लेकिन इन कायराना हरकतों से मज़दूरों का रोष और बढ़ा तथा यूनियन बनाने के प्रयास तेज हो गये। गत 16 जुलाई की शाम को प्रकाश विहार, करावल नगर में हुई बादाम मज़दूरों की विशाल सभा में ''बादाम मज़दूर यूनियन'' का गठन किया गया, जिसमें आम सहमति से 8 लोगों की संयोजन समिति का चुनाव किया गया। यूनियन की संयोजन समिति में दयानंद, सीतापति, सुमित्रा देवी, सुशीला देवी, रूदल, आशु, अभिनव व आशीष को सर्वसम्मति से चुना गया। इनमें से 5 सदस्य बादाम मजदूर हैं तथा अन्य नौजवान भारत सभा तथा बिगुल मजदूर दस्ता के कार्यकर्ता हैं जो काफी समय से बादाम मजदूरों को संगठित करने में लगे हुए हैं।
सभा में यूनियन के गठन की घोषणा का मजदूरों ने भरपूर उत्साह के साथ स्वागत किया। इसके बाद ''बादाम मजदूर यूनियन'' के बैनर तले हजारों की संख्या में मजदूरों का एक विशाल जुलूस निकाला गया। मजदूरों के उत्साहपूर्ण नारों के साथ जुलूस ने पूरे प्रकाश विहार तथा करावल नगर इलाके का चक्कर लगाया।
बिगुल मज़दूर दस्ता से जुड़े आशु ने कहा कि मज़दूरों को काम से निकालने, धमकाने व मार-पीट के बावजूद जिस साहस के साथ बादाम मज़दूरों ने अपनी यूनियन खड़ी की है वह इस संघर्ष की पहली जीत है और आगे भी यूनियन अपनी माँगें पूरी कराये बिना पीछे नहीं हटेगी। संयोजन समिति के सदस्य अभिनव ने कहा कि यूनियन का पंजीकरण भी जल्द ही करा लिया जायेगा जिसकी प्रक्रिया तत्काल शुरू कर दी गई है। यूनियन ने मजदूरों की मांगों को लेकर गतिविधियां आरंभ कर दी हैं। नौजवान भारत सभा के आशीष ने कहा कि ''बादाम मज़दूर यूनियन'' अपनी माँगों के लिए संघर्ष में कानूनी और आन्दोलनात्मक दोनों तरीकों से मालिकों को झुका कर रहेगा।
Thursday, June 5, 2008
कहां गये वे बच्चे

नोयडा और गाजि़याबाद से बच्चों के गायब होने की बढ़ती घटनाएं निठारी कांड जैसी किसी बड़ी आपराधिक गतिविधि की आशंका को बल दे रही है. पिछले 2 माह में केवल गाजि़याबाद के शहरी क्षेत्र से पुलिस के अनुसार 36 बच्चे लापता हैं जबकि सामाजिक संगठनों द्वारा की गयी जांच से पता चला है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है. ये सभी बच्चे गरीब तबके के हैं जिसके कारण पुलिस-प्रशासन ने इस मुद्दे पर अब तक बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है.
नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता की सयुंक्त जांच टीम द्वारा गाजि़याबाद और नोयडा की कुछ बस्तियों में 12 से 18 मई तक केवल एक सप्ताह के दौरान किए गये सर्वेक्षण में करीब 45 गुमशुदा बच्चों के बारे में पता चला. इनमें एक तिहाई संख्या लड़कियों की है. इनमें से अधिकांश बच्चे हाल ही में गुम हुए हैं.
इन संगठनों ने दिल्ली में एक प्रेस कान्फ्रेन्स में जांच रिपोर्ट 'कहां गये वे बच्चे' जारी करते हुए यह जानकारी दी.
नौजवान भारत सभा के तपीश मेन्दोला ने बताया कि नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता ने एक महीना पहले गाजि़याबाद जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर इस मामले में कार्रवाई करने का आग्रह किया था. इस पर भी कुछ न होते देख दोनों संगठनों ने साझा टीम गठित कर खुद ही इन मामलों की जांच करने का फैसला किया.
एक सप्ताह की अवधि में किए गये जांच पड़ताल के दौरान जांच टीम को गाजि़याबाद के नन्दग्राम, हर्ष विहार, विजयनगर, प्रताप विहार, संजय नगर, रईसपुर, मिर्जापुर, राहुल विहार, खोड़ा, टिगरी, खड्डा, अर्थला, विकलांग कालोनी, घुकना, दीनदयालपुरी, सलारपुर, करहेड़ा, श्यामपार्क एक्सटेंशन, बुद्धविहार, नवादा, प्यारे लाल कालोनी आदि और नोयडा के भंगेल, विशनपुरा, ममूरा, चोटपुर, छिजारसी के इलाकों में की गयी पू्छताछ के दौरान करीब 45 गुमशुदा बच्चों के बारे में पता चला. इनमें से कुछ बच्चे तो काफी समय से लापता है.
सूचना का अधिकार कानून के तहत गाजि़याबाद पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार इस वर्ष मार्च और अप्रैल माह में गाजि़याबाद के शहरी इलाकों से 36 बच्चे गुम हुए हैं जबकि मई माह में बड़ी संख्या में बच्चों के गायब होने की घटनाएं अखबारों में आ चुकी है. जांच के दौरान यह भी पता चला कि अनेक गरीब मां बाप डर के कारण पुलिस के पास ही नहीं जाते या फिर उनकी रिपोर्ट ही नहीं दर्ज की जाती हैं. जांच टीम को ऐसे कई मां बाप मिले जिन्हें पुलिस थानों से अपमानित करके और डरा धमका कर भगा दिया जाता था. किसी तरह अगर उनकी रिपोर्ट लिख भी ली गयी तो उस पर कोई कार्रवाई करने के बजाय पुलिसवाले या तो उनसे पैसे वसूलने की फिराक में रहते थे या उन्हें यूं ही दौड़ाते रहते थे.
रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षो में भारत मावअंगों के विश्वव्यापी व्यापार, चाइल्ड पोर्नोग्राफी और बाल वेश्यावृत्ति जैसे धन्धों का एक बड़ा निशाना बन गया है. निठारी जैसी घटनाओं के सामने आने के बावजूद पुलिस व प्रशासन में इस मामले के प्रति घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता का रवैया बरकरार है. उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का एक भी मामले में पालन नहीं किया गया है. निठारी कांड के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा गठित जांच समिति की संस्तुतियों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है.
(नौजवान भारत सभा व बिगुल मज़दूर दस्ता द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति का अंश)
नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता की सयुंक्त जांच टीम द्वारा गाजि़याबाद और नोयडा की कुछ बस्तियों में 12 से 18 मई तक केवल एक सप्ताह के दौरान किए गये सर्वेक्षण में करीब 45 गुमशुदा बच्चों के बारे में पता चला. इनमें एक तिहाई संख्या लड़कियों की है. इनमें से अधिकांश बच्चे हाल ही में गुम हुए हैं.
इन संगठनों ने दिल्ली में एक प्रेस कान्फ्रेन्स में जांच रिपोर्ट 'कहां गये वे बच्चे' जारी करते हुए यह जानकारी दी.
नौजवान भारत सभा के तपीश मेन्दोला ने बताया कि नौजवान भारत सभा और बिगुल मज़दूर दस्ता ने एक महीना पहले गाजि़याबाद जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर इस मामले में कार्रवाई करने का आग्रह किया था. इस पर भी कुछ न होते देख दोनों संगठनों ने साझा टीम गठित कर खुद ही इन मामलों की जांच करने का फैसला किया.
एक सप्ताह की अवधि में किए गये जांच पड़ताल के दौरान जांच टीम को गाजि़याबाद के नन्दग्राम, हर्ष विहार, विजयनगर, प्रताप विहार, संजय नगर, रईसपुर, मिर्जापुर, राहुल विहार, खोड़ा, टिगरी, खड्डा, अर्थला, विकलांग कालोनी, घुकना, दीनदयालपुरी, सलारपुर, करहेड़ा, श्यामपार्क एक्सटेंशन, बुद्धविहार, नवादा, प्यारे लाल कालोनी आदि और नोयडा के भंगेल, विशनपुरा, ममूरा, चोटपुर, छिजारसी के इलाकों में की गयी पू्छताछ के दौरान करीब 45 गुमशुदा बच्चों के बारे में पता चला. इनमें से कुछ बच्चे तो काफी समय से लापता है.
सूचना का अधिकार कानून के तहत गाजि़याबाद पुलिस द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार इस वर्ष मार्च और अप्रैल माह में गाजि़याबाद के शहरी इलाकों से 36 बच्चे गुम हुए हैं जबकि मई माह में बड़ी संख्या में बच्चों के गायब होने की घटनाएं अखबारों में आ चुकी है. जांच के दौरान यह भी पता चला कि अनेक गरीब मां बाप डर के कारण पुलिस के पास ही नहीं जाते या फिर उनकी रिपोर्ट ही नहीं दर्ज की जाती हैं. जांच टीम को ऐसे कई मां बाप मिले जिन्हें पुलिस थानों से अपमानित करके और डरा धमका कर भगा दिया जाता था. किसी तरह अगर उनकी रिपोर्ट लिख भी ली गयी तो उस पर कोई कार्रवाई करने के बजाय पुलिसवाले या तो उनसे पैसे वसूलने की फिराक में रहते थे या उन्हें यूं ही दौड़ाते रहते थे.
रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षो में भारत मावअंगों के विश्वव्यापी व्यापार, चाइल्ड पोर्नोग्राफी और बाल वेश्यावृत्ति जैसे धन्धों का एक बड़ा निशाना बन गया है. निठारी जैसी घटनाओं के सामने आने के बावजूद पुलिस व प्रशासन में इस मामले के प्रति घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता का रवैया बरकरार है. उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों का एक भी मामले में पालन नहीं किया गया है. निठारी कांड के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा गठित जांच समिति की संस्तुतियों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है.
(नौजवान भारत सभा व बिगुल मज़दूर दस्ता द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति का अंश)
Thursday, April 24, 2008
One more victim of capitalism - Reporter of worker's paper 'Bigul' implicated in false cases by police in Ludhiana
Several workers injured in boiler explosion - journalist Rajvinder arrested while gathering information about the incident - sections for attempt to murder and damage to public property imposedGoons hired by the factory owner beat up RajvinderWorkers lathi charged by the police, police raids workers' homes at midnight, even women and children not spared.
A dyeing unit of the 'Abhiverma Textiles' factory in the Basti Jodhewal police station area in Ludhiana was destroyed by the explosion in its boiler on Monday (21 April) night. The blast was so powerful that the entire unit was destroyed and even some adjacent factories suffered damage. The Ludhiana based reporter of workers' paper 'Bigul' and social activist Rajvinder reached at the spot on Tuesday morning as the news spread about workers being injured in the blast. He was accompanied by some workers of the adjacent Mahaveer Basti. Some anti-social elements hired by the factory owner attacked and beat him up when he was gathering information about the blast.At least half a dozen workers have been injured in the blast but the workers feared that some dead bodies may be buried in the debris and they might be removed with the connivance of the police. Therefore the workers were not ready to leave the factory gates and they clashed with the police. Rajvinder and some other social workers were also present there. Meanwhile, on Tuesday evening, the police lathi-charged and forced the workers away from the factory and then arrested Rajvinder. He has been booked under the sections for attempt to murder and damaging public property along with 50 unnamed persons.The police are openly with the factory owner. Even after such a terrible blast he has not been arrested and only a case of negligence has been filed against him. The police raided several homes in the Mahaveer Basti on Tuesday night and beat up the workers including women and children. Police are camping outside the basti and terrorising the workers.We fear that the police may torture Rajvinder and implicate him in some other serious case. Yesterday night he was severely beaten by the police and the henchmen of the factory owner inside the Basti Jodhewal police station.We appeal to you to mount pressure on the police and administrative officers in Ludhiana to immediately release Rajvinder and withdraw the false cases against him. You can also send fax and email messages to the Home Secretary of Punjab.
The contact numbers of these officials are as follows:
RK Jaiswal, SSP, Ludhiana -- 09815800402, 0161-2406055
Deputy Commissioner, Ludhiana -- 0161-2403100, Fax: 0161-2404502
Home Secretary, Punjab -- 0172-2740811 Ext. 4730,
Email: pshaj@punjabmail.gov.in
SP City (Mr Cheema) 09814457579
SHO Police Stn. Basti Jodhewal: 09815800135
A dyeing unit of the 'Abhiverma Textiles' factory in the Basti Jodhewal police station area in Ludhiana was destroyed by the explosion in its boiler on Monday (21 April) night. The blast was so powerful that the entire unit was destroyed and even some adjacent factories suffered damage. The Ludhiana based reporter of workers' paper 'Bigul' and social activist Rajvinder reached at the spot on Tuesday morning as the news spread about workers being injured in the blast. He was accompanied by some workers of the adjacent Mahaveer Basti. Some anti-social elements hired by the factory owner attacked and beat him up when he was gathering information about the blast.At least half a dozen workers have been injured in the blast but the workers feared that some dead bodies may be buried in the debris and they might be removed with the connivance of the police. Therefore the workers were not ready to leave the factory gates and they clashed with the police. Rajvinder and some other social workers were also present there. Meanwhile, on Tuesday evening, the police lathi-charged and forced the workers away from the factory and then arrested Rajvinder. He has been booked under the sections for attempt to murder and damaging public property along with 50 unnamed persons.The police are openly with the factory owner. Even after such a terrible blast he has not been arrested and only a case of negligence has been filed against him. The police raided several homes in the Mahaveer Basti on Tuesday night and beat up the workers including women and children. Police are camping outside the basti and terrorising the workers.We fear that the police may torture Rajvinder and implicate him in some other serious case. Yesterday night he was severely beaten by the police and the henchmen of the factory owner inside the Basti Jodhewal police station.We appeal to you to mount pressure on the police and administrative officers in Ludhiana to immediately release Rajvinder and withdraw the false cases against him. You can also send fax and email messages to the Home Secretary of Punjab.
The contact numbers of these officials are as follows:
RK Jaiswal, SSP, Ludhiana -- 09815800402, 0161-2406055
Deputy Commissioner, Ludhiana -- 0161-2403100, Fax: 0161-2404502
Home Secretary, Punjab -- 0172-2740811 Ext. 4730,
Email: pshaj@punjabmail.gov.in
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